By Faltukhabar
जब ट्रेन गुजरती है तो ज़मीन पर ज़ोर पड़ता है। पत्थर झटकों को सोख लेते हैं ताकि ट्रैक हिले नहीं।
पत्थरों की परत ट्रैक को स्थिर रखती है और लोहे के स्लीपर को हिलने नहीं देती।
बारिश या नमी का पानी नीचे चला जाता है ट्रैक के नीचे पानी जमा नहीं होता।
पत्थर ट्रेन के कंपन और आवाज़ को भी कम करते हैं, जिससे ट्रैक सुरक्षित और टिकाऊ रहता है।
पत्थरों की परत नीचे से घास या झाड़ियाँ उगने नहीं देती, जिससे रखरखाव आसान हो जाता है।
इन पत्थरों की परत को रेलवे की भाषा में “Ballast” कहा जाता है।
हर पत्थर का आकार और कोना जानबूझकर नुकीला रखा जाता है, ताकि वो एक-दूसरे में फँसकर ट्रैक को और मज़बूती दें।
ये खास तरह के कठोर पत्थर पास के पहाड़ों या खदानों से लाए जाते हैं, ताकि लंबे समय तक टिक सकें और रखरखाव आसान रहे।
“रेलवे ट्रैक के नीचे के पत्थर छोटे दिखते हैं, पर पूरी ट्रेन की स्थिरता इन्हीं पर टिकी होती है!”
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